पीपलकोटी की 13 अगस्त 2026 की घटना में नवीनतम उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार छह मजदूरों की मौत हुई है, 14 घायल हुए और दो मजदूरों की तलाश जारी थी। 22 मजदूर टनल के भीतर थे। हादसा पानी और मलबे के अचानक घुसने से हुआ।
हिमालय की सुरंगें या मजदूरों की कब्रगाह?
आखिर कब रुकेगा मौत का यह सिलसिला
जनगणमन.लाइव
उत्तराखंड को विकास चाहिए, सड़कें चाहिए, बिजली चाहिए और सुरंगों के माध्यम से पहाड़ों की दूरी कम करनी है। लेकिन सवाल यह है कि विकास की इस दौड़ की कीमत आखिर कौन चुका रहा है?
हिमालय की छाती को चीरकर बनाई जा रही सुरंगें बार-बार मजदूरों के लिए मौत का मुंह क्यों बन रही हैं?
चमोली के पीपलकोटी में 13 अगस्त को विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन टनल में पानी और मलबा घुसने से छह मजदूरों की मौत और 14 के घायल होने की खबर ने एक बार फिर उत्तराखंड के सुरंग निर्माण की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के समय 22 मजदूर टनल के भीतर थे। दो मजदूरों की तलाश जारी थी।
यह केवल एक हादसा नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें पहाड़ की प्रकृति बार-बार चेतावनी देती है और इंसान बार-बार उस चेतावनी को नजरअंदाज करता दिखाई देता है।
रैणी-तपोवन की त्रासदी को कैसे भूल सकते हैं?
7 फरवरी 2021 को चमोली की रैणी-तपोवन आपदा ने पूरी दुनिया को हिला दिया था। ऋषिगंगा क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे ने बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान किया। कुल मिलाकर 204 लोगों के मारे जाने अथवा लापता होने की रिपोर्ट सामने आई थी। इनमें लगभग 140 लोग तपोवन जलविद्युत परियोजना के कामगार थे। रैणी स्थित ऋषिगंगा परियोजना से जुड़े 35 मजदूर भी लापता बताए गए थे।
तपोवन की सुरंग में फंसे मजदूरों को निकालने की कोशिशें लंबे समय तक चलती रहीं। कई परिवारों को आज तक अपने परिजनों का इंतजार रहा।
उस त्रासदी के बाद उम्मीद थी कि उत्तराखंड में सुरंग निर्माण के सुरक्षा मानकों की नए सिरे से समीक्षा होगी।
लेकिन सवाल आज भी वही है—क्या हमने वास्तव में कुछ सीखा?
सिलक्यारा ने फिर चेताया
नवंबर 2023 में उत्तरकाशी की सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग में 41 मजदूरों के फंसने की घटना ने पूरे देश को चिंता में डाल दिया था। सौभाग्य से सभी 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
लेकिन 16 जुलाई 2026 को इसी सिलक्यारा सुरंग में एक मजदूर की कंक्रीट लाइनिंग का हिस्सा गिरने से मौत हो गई। इस घटना की जांच के आदेश भी दिए गए।
यानी सिलक्यारा का हादसा केवल अतीत की कहानी नहीं है। वह आज भी एक चेतावनी है।
और अब पीपलकोटी…
पीपलकोटी हादसे की सबसे गंभीर बात केवल यह नहीं कि टनल में पानी और मलबा घुसा।
गंभीर सवाल यह है कि क्या टनल में पहले से पानी का रिसाव और हल्का मलबा आने की जानकारी थी?
यदि ऐसा था, तो अगला सवाल और बड़ा है—
क्या उस चेतावनी को दर्ज किया गया?
क्या भूगर्भ वैज्ञानिकों को तत्काल बुलाया गया?
क्या टनल में काम रोककर सुरक्षा ऑडिट कराया गया?
क्या मजदूरों को बाहर निकालकर जोखिम क्षेत्र को खाली कराया गया?
इन सवालों का जवाब किसी जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए।
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पीपलकोटी हादसा निश्चित रूप से किसी अधिकारी, कंपनी या ठेकेदार की लापरवाही का परिणाम था। लेकिन यदि पानी और मलबे के पूर्व संकेत मौजूद थे और इसके बावजूद काम जारी रहा, तो यह जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होना चाहिए।
हिमालय सामान्य पहाड़ नहीं है
सबसे बड़ी भूल शायद यही है कि हिमालय को सामान्य निर्माण स्थल की तरह देखा जाता है।
हिमालय दुनिया की युवा और भूगर्भीय रूप से सक्रिय पर्वत श्रृंखलाओं में है। यहां चट्टानों की संरचना जगह-जगह बदलती है। कहीं कठोर चट्टान है तो कहीं कमजोर और दरारों वाली संरचना। पानी चट्टानों की दरारों से रास्ता बनाता है और सुरंग की खुदाई के बाद भूमिगत तनाव तथा जल प्रवाह का व्यवहार अचानक बदल सकता है।
इसलिए सुरंग की डीपीआर बनाते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि सुरंग कितनी लंबी है और उससे कितनी बिजली या कितने किलोमीटर की दूरी बचाई जाएगी।
यह देखना जरूरी है कि पहाड़ के भीतर वास्तव में है क्या?
कहां फॉल्ट जोन है?
कहां कमजोर चट्टान है?
कहां भूमिगत जल का दबाव है?
कहां पुराना भूस्खलन क्षेत्र है?
कहां चट्टान का व्यवहार खुदाई के बाद बदल सकता है?
भूगर्भीय रिपोर्ट केवल कागज न बने
सुरंग निर्माण में भूगर्भीय जांच कोई औपचारिकता नहीं हो सकती।
कागज पर तैयार की गई प्रारंभिक रिपोर्ट और जमीन के भीतर वास्तविक भूगर्भीय स्थिति में अंतर हो सकता है। इसलिए खुदाई आगे बढ़ने के साथ-साथ रियल टाइम जियोलॉजिकल मॉनिटरिंग आवश्यक है।
टनल के भीतर पानी का प्रवाह बढ़ना, चट्टानों में दरारें आना, छत से छोटे पत्थरों का गिरना, मलबे का रिसाव, सुरंग की लाइनिंग में बदलाव, जमीन का कंपन—ये सभी संकेत हो सकते हैं।
इन संकेतों को ‘छोटी समस्या’ मानना बड़ी भूल हो सकती है।
जल्दी काम पूरा करने का दबाव कितना जिम्मेदार?
बड़ी परियोजनाओं पर समय और लागत का दबाव स्वाभाविक है। लेकिन पहाड़ की गति ठेके की समय सीमा से नहीं चलती।
यदि परियोजना को जल्दी पूरा करने के दबाव में सुरक्षा निरीक्षण, रॉक सपोर्ट, ड्रेनेज, शॉटक्रिट, बोल्टिंग, लाइनिंग अथवा भूगर्भीय परीक्षण में समझौता किया जाता है, तो उसकी कीमत अंततः मजदूर को अपनी जान देकर चुकानी पड़ सकती है।
सुरंग की प्रगति मीटर में मापी जाती है, लेकिन मजदूर की जिंदगी की कीमत किसी मीटर से नहीं मापी जा सकती।
मजदूर सबसे कमजोर कड़ी क्यों?
एक और गंभीर प्रश्न मजदूरों की स्थिति का है।
परियोजनाओं में इंजीनियर, अधिकारी और विशेषज्ञ ऊपर से निर्णय लेते हैं, लेकिन जमीन के सबसे भीतर, सबसे खतरनाक हिस्से में काम करने वाला मजदूर अक्सर सबसे कमजोर स्थिति में होता है।
उसे यह जानने का अधिकार है कि जिस सुरंग में वह प्रवेश कर रहा है वहां वास्तविक जोखिम क्या है।
उसे प्रशिक्षित होना चाहिए।
उसे पर्याप्त सुरक्षा उपकरण मिलने चाहिए।
आपातकालीन निकासी का रास्ता होना चाहिए।
संचार व्यवस्था होनी चाहिए।
हर शिफ्ट में वास्तविक समय का श्रमिक रिकॉर्ड होना चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—किसी भी मजदूर को असुरक्षित स्थिति में काम करने से मना करने का अधिकार होना चाहिए।
2025 में मॉक ड्रिल हुई, फिर सवाल क्यों?
दिलचस्प बात यह है कि THDC ने जुलाई 2025 में विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना में बाढ़ और सुरंग बचाव की बहु-एजेंसी मॉक ड्रिल भी कराई थी। इसमें सुरंग के भीतर काम कर रहे मजदूरों की निकासी, संचार, हेडकाउंट और बचाव प्रणाली का परीक्षण किया गया था।
यदि सुरक्षा व्यवस्था का परीक्षण हुआ था तो अब जांच का एक सवाल यह भी होना चाहिए कि मॉक ड्रिल में जो व्यवस्था कागज और अभ्यास में सफल थी, वास्तविक आपदा में वह कितनी प्रभावी रही?
हादसे के बाद जांच नहीं, हादसे से पहले निगरानी चाहिए
उत्तराखंड में अक्सर हादसा होता है।
फिर राहत और बचाव शुरू होता है।
फिर मुआवजे की घोषणा होती है।
फिर जांच समिति बनती है।
कुछ समय बाद मामला ठंडा पड़ जाता है।
फिर अगली परियोजना में वही कहानी दोहराई जाती है।
यह व्यवस्था बदलनी होगी।
हमें Post-Accident Investigation से आगे बढ़कर Pre-Accident Risk Prevention की व्यवस्था बनानी होगी।
हर सुरंग के लिए स्वतंत्र भूगर्भीय सुरक्षा ऑडिट हो।
हर बड़े भूगर्भीय बदलाव के बाद काम रोककर पुनर्मूल्यांकन हो।
टनल के भीतर जल प्रवाह की लगातार निगरानी हो।
रियल टाइम सेंसर और अलार्म सिस्टम लगाए जाएं।
स्वतंत्र सुरक्षा अधिकारी को काम रोकने का अधिकार मिले।
और सुरक्षा मानकों की निगरानी परियोजना संचालक से स्वतंत्र एजेंसी करे।
विकास चाहिए, लेकिन किस कीमत पर?
उत्तराखंड में बिजली परियोजनाएं राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। सड़क और सुरंगें भी जरूरी हैं। इसका मतलब यह नहीं कि विकास रोक दिया जाए।
लेकिन विकास का अर्थ यह भी नहीं कि पहाड़ की भूगर्भीय क्षमता को नजरअंदाज कर दिया जाए।
हमें यह तय करना होगा कि हम पहाड़ से कितना ले सकते हैं और पहाड़ को कितना सहन करने देना चाहिए।
हिमालय कोई निर्जीव निर्माण स्थल नहीं है।
यह लगातार बदलती हुई भूगर्भीय व्यवस्था है।
यहां प्रकृति की छोटी-सी चेतावनी भी बड़े हादसे में बदल सकती है।
अब सवाल सरकार से नहीं, पूरी व्यवस्था से है
पीपलकोटी हादसे की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
सिर्फ यह पता लगाना पर्याप्त नहीं कि हादसे के समय टनल में क्या हुआ।
यह पता लगाना जरूरी है कि हादसे से पहले क्या-क्या हुआ था।
क्या पानी का रिसाव था?
क्या मलबा गिर रहा था?
क्या किसी मजदूर या इंजीनियर ने खतरे की सूचना दी?
क्या काम रोकने का निर्णय लिया गया?
क्या भूगर्भ वैज्ञानिकों ने उस हिस्से को सुरक्षित बताया था?
क्या सुरक्षा ऑडिट हुआ था?
क्या जोखिम के बावजूद मजदूरों को अंदर भेजा गया?
और अगर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी केवल किसी छोटे कर्मचारी पर डालकर मामला खत्म नहीं होना चाहिए।
जिम्मेदारी उस स्तर तक तय होनी चाहिए जहां निर्णय लिया गया।
क्योंकि मजदूर की मौत केवल एक दुर्घटना नहीं है। कई बार वह उस व्यवस्था की विफलता होती है, जिसने खतरे को पहचानने के बावजूद उसे रोकने की कोशिश नहीं की।
पीपलकोटी हमें फिर चेतावनी दे रहा है।
सवाल यह नहीं कि अगली सुरंग कब बनेगी।
सवाल यह है कि अगली सुरंग में मजदूर सुरक्षित घर लौटेंगे या फिर किसी पहाड़ी परियोजना की प्रगति रिपोर्ट में सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाएंगे।
हिमालय को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं जिसकी नींव मजदूरों की कब्रों पर रखी जाए।
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