एस आई आर में शिकायतों का खेल !? पिता-पुत्र की उम्र में 15 साल का अंतर बताकर विधायक को नोटिस

  1. जनगणमन.लाइव 21 अगस्त

SIR में शिकायतों का खेल? पिता-पुत्र की उम्र में 15 साल का अंतर बताकर विधायक को नोटिस
मंगलौर विधायक काजी निजामुद्दीन के मामले ने उठाए सवाल, शिकायतों की जांच किए बिना नोटिस भेजने का आरोप
देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)-2026 प्रक्रिया को मतदाता सूची के शुद्धिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, लेकिन दावे और आपत्तियों के निस्तारण की प्रक्रिया को लेकर अब सवाल भी उठने लगे हैं। आरोप है कि कुछ लोग मतदाता सूची में वास्तविक त्रुटियां सुधारने के बजाय व्यक्तिगत रंजिश या अन्य कारणों से आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं और शिकायतों की प्रारंभिक जांच के बिना संबंधित लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं।

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ऐसा ही एक रोचक मामला हरिद्वार जिले की मंगलौर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक काजी निजामुद्दीन का सामने आया है। विधायक को एक आपत्ति के आधार पर नोटिस भेजा गया, जिसमें कथित रूप से उनके और उनके पिता की उम्र में केवल 15 वर्ष का अंतर बताया गया।
मामले ने इसलिए सवाल खड़े किए क्योंकि काजी निजामुद्दीन के पिता मोहम्मद मोहिउद्दीन वर्ष 1974 में विधायक बने थे और उसी वर्ष काजी निजामुद्दीन का जन्म बताया गया है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि यदि पिता-पुत्र की उम्र में वास्तव में केवल 15 वर्ष का अंतर होता तो वर्ष 1974 में मोहम्मद मोहिउद्दीन की उम्र महज 15 वर्ष के आसपास होती। ऐसे में क्या उस समय कोई किशोर विधानसभा चुनाव लड़कर विधायक बन सकता था?
बताया गया कि मोहम्मद मोहिउद्दीन वर्ष 2002 तक विधायक रहे। इसके बाद काजी निजामुद्दीन ने भी मंगलौर क्षेत्र की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और कई बार विधायक चुने गए।
विधायक काजी निजामुद्दीन के मामले में आपत्ति का निस्तारण हो गया हो, लेकिन इस प्रकरण ने SIR प्रक्रिया में आने वाली शिकायतों की जांच और सत्यापन प्रणाली पर बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या किसी शिकायत या आपत्ति को संबंधित व्यक्ति को नोटिस भेजने से पहले उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर प्राथमिक स्तर पर जांचा जा रहा है?
आलोचकों का कहना है कि यदि बिना पर्याप्त प्रारंभिक परीक्षण के हर शिकायत पर सीधे नोटिस जारी किए जा रहे हैं तो आम मतदाताओं को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। कई लोगों को अपनी पहचान, उम्र और पारिवारिक विवरण सही साबित करने के लिए दस्तावेज लेकर कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं।

कांग्रेस एस आई आर समिति के प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व विधायक मनोज रावत का कहना था कि इन नोटिस का कोई मतलब नही है और ये जनता को उलझने और लाइन में लगाने का एक तरीका है

मामले ने निर्वाचन आयोग और उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के समक्ष यह सवाल भी खड़ा किया है कि SIR जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में शिकायत दर्ज करने की स्वतंत्रता के साथ-साथ शिकायतों की प्राथमिक जांच और जवाबदेही का मजबूत तंत्र भी होना चाहिए, ताकि मतदाता सूची के शुद्धिकरण का उद्देश्य बना रहे और प्रक्रिया अनावश्यक शिकायतों का माध्यम न बन जाए।

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