जनगणमन.लाइव | 24 सितंबर 2026
नई दिल्ली। निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बीच आयोग ने बुधवार को स्पष्ट किया कि उसके सभी महत्वपूर्ण फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने आंतरिक टिप्पणियों और असहमतियों को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया है।
यह स्पष्टीकरण Indian Express की उस जांच रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें बताया गया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के निर्णयों और आदेशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने कहा कि निर्णय या आदेश उनकी जानकारी अथवा स्वीकृति के बिना जारी किए गए।
क्या थीं 14 आपत्तियां?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार दर्ज आपत्तियों का क्रम इस प्रकार है
1. 28 अक्टूबर 2025 — सुखबीर सिंह संधू
आयोग की मंजूरी के बिना निर्वाचन आयोग के नाम से पत्र और आदेश जारी किए जाने पर सवाल।
2. 16 अप्रैल 2026 — सुखबीर सिंह संधू
नए IT मॉड्यूल और पोर्टल के बारे में उन्हें आयोग के भीतर से नहीं, बल्कि मीडिया के माध्यम से जानकारी मिलने पर आपत्ति।
3. 16 अप्रैल 2026 — सुखबीर सिंह संधू
आयोग की मंजूरी के बिना संदेश जारी किए जाने पर सवाल।
4. 16 अप्रैल 2026 — विवेक जोशी
आयोग की बैठकों के मिनट्स जारी होने और अगली बैठक का एजेंडा पहले उपलब्ध नहीं कराए जाने की प्रक्रिया पर आपत्ति।
5. 16 अप्रैल 2026 — विवेक जोशी
आयोग की मंजूरी के बिना अधिकारियों को विदेश यात्राओं पर भेजे जाने पर सवाल।
6. 24 अप्रैल 2026 — विवेक जोशी
उन्होंने दोबारा कहा कि आयोग की मंजूरी के बिना कोई आधिकारिक संदेश जारी नहीं किया जाना चाहिए।
7. 16 मई 2026 — विवेक जोशी
नए मतदाताओं के लिए Form-6 में बदलाव सरकार की मंजूरी के बिना किए जाने पर आपत्ति। रिपोर्ट के अनुसार संधू ने 19 मई को इस पर सहमति जताई।
8. 29 मई 2026 — विवेक जोशी
मतदाता सूची के डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण पर सवाल उठाते हुए ऑडिट की जरूरत बताई।
9. 29 जुलाई 2026 — विवेक जोशी
कैबिनेट सचिव को लिखकर आरोप लगाया कि एक अधिकारी आयोग की जानकारी के बिना काम का बंटवारा कर रहा था।
10. 29 जुलाई 2026 — सुखबीर सिंह संधू
काम के आवंटन से जुड़े मुद्दे को दोहराया और संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
11. 30 जुलाई 2026 — संधू और जोशी
दोनों आयुक्तों ने काम के आवंटन से जुड़े एक आदेश को रद्द कर दिया।
12. 12 अगस्त 2026 — सुखबीर सिंह संधू
पश्चिम बंगाल के एक ट्रिब्यूनल के सामने आयोग की ओर से अपील करने की अनुमति किसने दी, इस पर सवाल।
13. 13 अगस्त 2026 — सुखबीर सिंह संधू
Form-6 में किए गए बदलाव को “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताया गया।
14. 14 अगस्त 2026 — सुखबीर सिंह संधू
मैदानी अधिकारियों को ECINet सिस्टम तक पहुंच नहीं मिलने पर सवाल उठाया गया और कहा गया कि IT महानिदेशक के पास ऐसी पहुंच प्रतिबंधित करने का अधिकार नहीं है।
आयोग का जवाब भी महत्वपूर्ण
इन आपत्तियों के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने 23 सितंबर को जारी प्रेस नोट में कहा कि लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक चैक एंड बैलेंस उसकी सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। आयोग ने कहा कि अलग-अलग विचार अंतिम निर्णय से पहले होने वाली प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक वर्ष में लगभग 40 नई पहल और कई चुनाव सुधार किए गए और ये निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से हुए। आयोग ने एस आई आर सहित मतदाता सूची पुनरीक्षण का भी उल्लेख किया।
लेकिन बहस यहीं खत्म नहीं होती
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक अंतर सामने आता है। आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए, जबकि प्रकाशित जांच रिपोर्ट में दो आयुक्तों द्वारा निर्णय प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में दर्ज की गई 14 आपत्तियों का विवरण दिया गया है।
इसलिए मूल सवाल केवल यह नहीं है कि आयोग के भीतर असहमति होना सामान्य है या नहीं। सवाल यह भी है कि इन 14 आपत्तियों पर आयोग ने क्या निर्णय लिया, किस आपत्ति को स्वीकार या अस्वीकार किया गया और अंतिम निर्णय तक पहुंचने की प्रक्रिया क्या थी?
खासकर फार्म 6 मतदाता सूची के डेटा के केंद्रीकरण और ECINet तक मैदानी अधिकारियों की पहुंच जैसे मुद्दे सीधे मतदाता पंजीकरण और चुनावी सूची की प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े हैं। रिपोर्ट में इन्हीं विषयों पर आपत्तियों का उल्लेख किया गया है।
‘सर्वसम्मति’ बनाम ‘आपत्तियों का रिकॉर्ड’
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मत होने का आयोग का दावा और निर्णय प्रक्रिया में दर्ज 14 आपत्तियां—दोनों को साथ रखकर देखा जाना चाहिए।
किसी आयुक्त की आपत्ति दर्ज होना अपने आप में किसी निर्णय को गैरकानूनी साबित नहीं करता। इसी तरह आयोग द्वारा किसी निर्णय को सर्वसम्मत बताया जाना यह सवाल अपने आप खत्म नहीं करता कि उस निर्णय से पहले दर्ज की गई आपत्तियों का निस्तारण किस प्रकार हुआ।
यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
यदि संबंधित आपत्तियों, उनके जवाबों और अंतिम निर्णयों का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाता है तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि 14 आपत्तियों में उठाए गए सवालों पर आयोग के भीतर क्या विचार हुआ और अंतिम निर्णय किस आधार पर लिया गया।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल अंतिम फैसले से नहीं, बल्कि उस फैसले तक पहुंचने वाली प्रक्रिया की पारदर्शिता से भी जुड़ी है।
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